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    धन कुबेरो के घर में रौशनी फैलाने वाले चाक कलाकरों के घरों में अँधेरा

    गया (प्रतिनिधि) भारत में चाक कलाकरों द्वारा मिट्टी के दीपक का उद्भव पांच हजार वर्ष पूर्व माना गया है। प्राचीन सम्यता के तहत मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई में कई प्रकार के दीपक मिले थे। भारत के कुषाण वंश कें शासक समय गोल दीपक काफी गहराई भरे होते थे। हलांकि आज कल के चाक कलाकारों द्वारा बनने वाले दीपक गुप्तकाल की तरह के है। गुप्तकाल, मुगलकाल, गांधार काल में दीपक भले ही किसी भी सभ्यता व संस्कृति में विभिन्न आकार व प्रकार के बनते रहे हो, लेकिन हर काल में ये प्रकाश के प्रतीक ही माने गए।
    हिंदू संस्कृति में दीपक को इतना महत्व दिया गया है कि यहां दीपकों का निर्माण करने वाले चाक कलाकारों (कुम्हार) ने भी विभिन्न प्रकार के दीपकों का निर्माण कर उसके आकार व प्रकार से उसके सौंदर्य को बढ़ावा दिया। वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और त्योहारों पर दूसरे देशों की भी नजर है। इसका प्रभाव चाक कलाकरों पर भी देखने को मिलता है। आज भारतीय बाजार पर चीन का अच्छा-खासा प्रभाव देखा जा सकता है। इस समय दीपावली की रौनक बढ़ाने के लिए चीन में बने सजावट के इलेक्ट्रानिक्स समान लक्ष्मी उत्सव की शोभा बढ़ा रहे है।

           दो दशक पूर्व रोशनी का पर्व दीपावली आनें से पूर्व ही चाक कलाकार मिट्टी के दीपक बनाने में जुट जातें थे। लेकिन आज के समय में घटती मांग को देख कर मिट्टी के दीये बनाना भी कम कर दिया। अब मिट्टी के पुश्तैनी चाक कलाकार इस व्यवसाय को छोड़कर अन्य कार्य करने लगे है। मानपुर, डंडीबाग एवं माड़नपुर बाईपास गया, बिहार में रहने वाले चाक कलाकारों ने बताया कि हमारे जीवन-यापन का एक मात्र साधन चाक ही था। मगर आज इसकी रफ्तार धीमी पड़ गयी है और अब इस से बच्चों एवं परिवार का पालन-पोषण करने में असक्षम हो गयी है। अब हमारी नई पीढ़ी इस कला को सिखना भी नहीं चाहती है अब अगर ऐसा हुआ तो यह चाक कला विलुप्त हो जायेगी। समाज एवं सरकार के तरफ से अगर संरक्षण नहीं मिला तो हम चाक कला को तस्वीरों व संग्रहालय में ही देख पायेगें।
            मैं चाक कला को बचाने हेतु कई वुद्धिजीवियों से मुलाकात की एवं बातचीत के क्रम में गया, बिहार के समाज सेवी एवं अधिवक्त योगेन्द्र कुमार सिन्हा (अंजय बाबू) ने कहा कि इस दीपावली आप कुम्हारों (चाक कलाकारों) द्वारा बनाये गये मिट्टी के बने दीपक, लक्ष्मी गणेश की मूर्ति का व्यापक रूप में प्रयोग करने का संकल्प लें ताकि कुम्हार अपने पुश्तैनी व्यवसाय से जीविकोपार्जन कर अपने बच्चों का पालन पोषण कर सकें। इससे न केवल पर्यावरण शुद्व रहेगा, बल्कि कुम्हारों का आर्थिक  स्थिति भी सुदृढ़ होगी।
            पं0 सतेन्द्र पाठक ने बताया कि मिट्टी के दीये एवं भगवान गणेश लक्ष्मी की मूर्ति का प्रयोग करें। मिट्टी के दीये जलाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है, माता अपने भक्तों को आर्शीवाद प्रदान करती है। इस बार त्योहार में मिट्टी के दीये जलायें। जिससे आपके घर के साथ साथ चाक कलाकारों के घर भी रोशन हो।
            दीपक तले अँधेरा यह उक्ति सही बैठती है भारत के चाक से दीये बनाने वाले कलाकारों के साथ दीये से दूसरे के घरों को रौशन करने वाले चाक कलाकरों के खुद का जीवन आज अँधेरे में है। माँ लक्ष्मी की आराधना एवं धन कुबेरो के घर में रौशनी फैलाने वाला चाक कलाकारों के घरों में अधेरे की बजह ढूँढ़ना होगा ............
                                                                                      -- धनंजय सिन्हा
                                                                                                                           9304612287 
                                                                                                            dhananjaysinhagaya@gmail.com      
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